BPSC UPSC Mains 2011 HOT TOPIC-II: 8 History of Delhi [@ 100 Years]   1 comment

Public Service Commission preparation

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दिल्ली का इतिहास- सौ वर्ष की दिल्ली

General दिल्ली ने देश की राजधानी बने सौ वर्ष पूरे कर लिए। दिल्ली ने इन सौ वर्षो में बहुत कुछ देखा और बहुत कुछ सहा भी। दिल्ली ने जहां भारत को बनते देखा वहीं इसके दामन पर खून के छींटे भी लगते देखा। सौ वर्ष पहले जब जार्ज पंचम का राज्यभिषेक हुआ और कलकत्ता से दिल्ली को राजधानी बनाने का फैसला हुआ तो कोई नहीं जानता था कि दिल्ली उसके बाद हमेशा के लिए राजनीतिक गलियारों की अहम जगह बन जाएगी। इस बनती बिगड़ती की कहानी भी बड़ी अनूठी है। 12 दिसंबर 1911 में दिल्ली को भारत की राजधानी बनाया गया और दिल्ली को मिली अपनी नई पहचान। 1772 से 1911 तक कलकत्ता ही भारत की राजधानी थी। आज के ही दिन जार्ज पंचम का भारत के शासक के तौर पर राज्यभिषेक हुआ और दिल्ली में एक विशाल दरबार लगाया गया। यह दरबार कोई मामूली दरबार नहीं था, बल्कि इस दरबार में अंग्रेजी हुकुमरानों ने अपने को शासक के तौर पर भारत पर काबिज कर दिया था। इस राज्यभिषेक के दौरान हाजिरी लगाने पूरे देश के नवाब और राजा पहुंचे थे। इसका अर्थ यह था कि उन्होंने अंग्रेजी हुकुमत को स्वीकार कर लिया था। वर्षो पहले व्यापार करने भारत में आई ब्रिटिश इंडिया कंपनी ने भारत पर राज करने की शुरूआत सही मायने में यहीं से की थी। राजधानी बनने के बाद दिल्ली की पहचान बदल गई। अब दिल्ली एक अलग मुकाम बना चुकी थी। सियासी गलियारों में अहम हो चुकी थी दिल्ली। मुगल सल्तनत और मिर्जा गालिब की दिल्ली अब बहुत कुछ देखने वाली थी। निजामुद्दीन औलिया पर गाए जाने वाली कव्वालियों और दिल्ली के लाल किले में होने वाले शाही मुशायरों के बीच पश्चिम संस्कृति भी बसने लगी थी। चांदनी चौक के आस पास अंग्रेजी हुकुमरानों के घोड़ों की टापों से दिल्ली का रोज आमना सामना होने लगा था। दिल्ली अब आजादी के मतवालों का गढ़ बनने लगा था। दिल्ली ने आजादी की आखिरी लड़ाई को भी बेहद करीब से देखा। दिल्ली कभी अंग्रेजी सत्ता और कभी भारतीयों को इस पर काबिज होते देखा। दिल्ली पर काबिज आखिरी मुगल बादशाह खुद बड़े आला दर्जे के शायर थे और उनके मुशायरे में अकसर मिर्जा गालिब और जौक जैसे शायर शिरकत करते थे। उस वक्त के लालकिला में इस मुशायरे के बीच वाह वाही की आवाजें खूब जोर शोर से गूजां करती थीं। उस वक्त की श्वेत श्याम दिल्ली आज पूरी तरह से तबदील हो चुकी है। वक्त के साथ दिल्ली की खूबसूरती पर भी चार चांद लग गए हैं। उस वक्त की हवेलियां आज भी दिल्ली में शानौशौकत की मिसाल पेश करती हैं। चंद दरवाजों में रची बसी उस वक्त की दिल्ली आज भारत के सियासी गलियारों में कितनी अहम है इसे बताने की कोई जरूरत यहां समझ नहीं आती। दिल्ली की खूबसूरती और यहां की आबौ हवा पर ही दिल्ली के शायर ने कहा था कौन जाए जौक अब दिल्ली की गलियां छोड़ कर। वहीं मिर्जा गालिब को भी दिल्ली इतनी रास आई कि आखिर तक उन्होंने इस दिल्ली का साथ नहीं छोड़ा। दिल्ली के बल्लीमारान में आज भी मिर्जा गालिब की हवेली मौजूद है जहां के दरो दीवार से उनके कलाम की खुशबू आज भी महसूस की जा सकती है। दिल्ली में आज भी जहां तहां पुरानी हवेलियां देखने को मिल जाती हैं। हालांकि मौजूदा दौर में यह भले ही बदल चुकी हैं लेकिन इन्हें देखकर उस वक्त की खूबसूरत दिल्ली की कल्पना जरूरी की जा सकती है। उस वक्त के वायसराए हाउस को आज का राष्ट्रपति भवन कहा जाता है। जिस वक्त सर लूटियन ने इसका निर्माण करवाया था उस वक्त उनके जहन में दिल्ली की सबसे ऊंची पहाड़ी से पूरी दिल्ली पर नजर डालना हुआ करता था। लेकिन वक्त के साथ इसमें भी बदलाव आ गया और आज यह बाकि दिल्ली के बराबर आ खड़ा हुआ है। दिल्ली का कश्मीरी गेट जहां आज बड़ी आटो पार्टस की मार्किट दिखाई देती है वह वास्तव में अंग्रेजों के लिए बनाई गई खास किस्म का बाजार हुआ करती थी जहां हिंदुस्तानियों का आने पर पाबंदी थी। तब से अब तक दिल्ली की सूरत भले ही बदल गई हो लेकिन नहीं बदली इसकी शान जो आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है।

 

Courtesy: Jagran Samachar.

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